एक आसू तुम्हारी याद मे मशहूर होगा...
खुदा का वास्ता देकर वो तुमको ले गए थे
हमे ना इल्म था के बाप भी मजबूर होगा...
इरादे पाक लेकरके मोहोबत रौंध जो डाली
बडी दुनिया है ये जालीम यही दस्तुर होगा...
हमे जो बाज कह करके शिकारी खुद्द छीपा भितर
उन्हे लगता है बस्ती से वो कोसो दूर होगा...
हमारी यादमे अक्सर जमाना मुस्कराया हैं
मिला जो आदमी तुमको वही मगरुर होगा...
दलीले लाख देकर के न होगा कुछ यहा 'निर्मल'
जमाना- एँ- खुदा भी तो नहि मंजूर होगा...
नीरज पुरुषोत्तम चौधरी
28/03/2022