रोज एक बात अधूरी रहती है
रोज वक़्त बीत जाता है,
रोज लम्हा गुज़र जाता है,
रोज इस रोज़ से तंग आकर
रोज उस रोज़ से आस रखता हूँ
आज तुम मिलो तो आज बात होगी
आज सुकून मिलेगा, आज रोज़ जैसा न हो — ये उम्मीद है
आज भी वही उम्मीद है जो रोज़ होती है
आज में कल का कितना कुछ है, और कल में आज का
आज फिर भी आज है और कल है कल
आज तुम मिलो तो करते हैं बात
आज कल से होने की
रोज़ रोज़ को खोने की
आज आओ तो याद दिलाना
आज फिर से रोज़ की तरह कुछ कहना है
आज से फिर रोज़ की तरह उम्मीद है
आज बात अधूरी न रहे
हर रोज़ की तरह
आज हर रोज़, हर कल की तरह
बीत जाना है — तुम्हें कुछ कहते-कहते
आज तुम्हारा होना जरूरी है
हर रोज़ और कल से भी ज़्यादा
नीरज पुरुषोत्तम चौधरी
19/06/2025
दमन
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